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Saturday, June 4, 2011

सब कर के भी महंगी पड़ी निकम्माँयी

आज ऐसी दिल में कशिश सी हुई
पता नहीं क्यों जाग कर भी नींद है आई
जरा कोई समझे मेरे इस हालात को
सब कर के भी महंगी पड़ी निकम्माँयी ...
जिंदगी ने मोड़ लिया जीवन में प्यार की घटा छाई
पर क्यों इस प्यार ने दर्द दिया ये समझ ना आई
क्या कमी थी मुझमे यह तो कोई नहीं जनता
पर किसी  को रास ना आई मेरे प्यार की गहराई !!!
मुझे है पता के लोग होते हैं बेवफा
पर फिर भी दिखी सबको मेरी बेवफाई........
चाह मैंने के ला दूँ उसके जीवन में उजियारा...
दूर करूँ अँधेरा और दिखा दू  उसे जीवन सारा
प्यार होता है कठिन ये पाठ आब याद आई,
जरा कोई समझे मेरे इस हालात को
सब कर के भी महंगी पड़ी निकम्माँयी ...

===मन वकील.....

प्रिये माँ के लिए

जितना मैं पढता था,शायद उतना ही वो भी पढ़ती,
मेरी किताबों को वो मुझसे ज्यादा सहज कर रखती,
मेरी कलम, मेरी पढने की मेज़ , उसपर रखी किताबे,
मुझसे ज्यादा उसे नाम याद रहते, संभालती थी किताबे,
मेरी नोट-बुक पर लिखे हर शब्द, वो सदा ध्यान से देखती,
चाहे उसकी समझ से परे रहे हो, लेकिन मेरी लेखनी देखती,
अगर पढ़ते पढ़ते मेरी आँख लग जाती, तो वो जागती रहती,
और जब मैं रात भर जागता ,तब भी वो ही तो जागती रहती,
और मेरी परीक्षा के दिन, मुझसे ज्यादा उसे भयभीत करते थे,
मेरे परीक्षा के नियत दिन रहरह कर, उसे ही भ्रमित करते थे,
वो रात रात भर, मुझे आकर चाय काफी और बिस्कुट की दावत,
वो करती रहती सब तैयारी, बिना थके बिना रुके, बिन अदावात,
अगर गलती से कभी ज्यादा देर तक मैं सोने की कोशिश करता,
वो आकर मुझे जगा देती प्यार से, और मैं फिर से पढना शुरू करता,
मेरे परीक्षा परिणाम को, वो मुझसे ज्यादा खोजती रहती अखबार में,
और मेरे कभी असफल होने को छुपा लेती, अपने प्यार दुलार में,
जितना जितना मैं आगे बढ़ता रहा, शायद उतना वो भी बढती रही,
मेरी सफलता मेरी कमियाबी, उसके ख्वाबों में भी रंग भरती रही,
पर उसे सिर्फ एक ही चाह रही, सिर्फ एक चाह, मेरे ऊँचे मुकाम की,
मेरी कमाई का लालच नहीं था उसके मन में, चिंता रही मेरे काम की,
वो खुदा से बढ़कर थी पर मैं ही समझता रहा उसे नाखुदा की तरह जैसे,
वो मेरी माँ थी, जो मुझे जमीं से आसमान तक ले गयी, ना जाने कैसे .....
=====प्रिये माँ के लिए....मन-वकील

Tuesday, May 31, 2011

बेचैनी

This contribution has been made by Sheena!!!

हो रही है बेचैनी सी, कुछ तो लिखना है मुझे,
ना हो बात जो ख़ुद पता पर, वो कोई कैसे कहे?

इंतज़ार की आदत जिसको, बरसों से है हो गई
मिलन के सपने बुनने की समझ उसे कैसे मिले?

उजड़े महलों पर ही नाचना, जिसने हरदम सीखा हो
रंगशाला की चमक भला, कैसे उसकी आँख सहे?

जिसने हँसना सीखा है, ज़िन्दग़ी के मज़ाक पर
दे देना मत उसको खुशी, खुशी का वो क्या करे?

मौत महास्वावलंबी है

One of the most heart touching poem by Mr Sashwat Bharadwaj

(तुम और तुम्हारी मौत एक ही लग्न में जन्म लेते हैं, पर मौत पहले मर सकती है।)

किसी की उम्र कम
किसी की लंबी है,
और मौत महास्वावलंबी है।
अपना निर्णय स्वयं लेगी,
तुम्हारे चिंता करने से
न तो आएगी
न आने से रुकेगी।
चिंता करके
स्वयं को मत सताओ,
मौत जब भी फोटो खींचना चाहे
मुस्कराओ।
रौनक आ जाती है फोटो में
तुम्हारी दो सैकिंड की मुस्कान से,
ज़िंदगी भर मुस्कुराओगे तो
कभी नहीं जाओगे जान से।

सुनो! तुम्हारे पैदा होते ही
तुम्हारी मौत भी पैदा हो जाती है।
ठीक उसी घड़ी उसी मुहूर्त
उसी लग्न उसी व़क्त
तुमसे कहीं ज़्यादा मज़बूत और सख़्त।
याद रखना मौत मुस्कराती नहीं है,
कोयल की बोली में गाती नहीं है।
वह तो चील-गिद्ध कउओं की तरह
सिर पर मंडराती है
हंसी उसे आती नहीं है।
दांत फाड़े जब वो तुम मुस्कुराओ,
और जब दहाड़े तुम गुनगुनाओ।

वृद्धावस्था तक
अपनी ताक़त खोने से
वो खोखली हो जाएगी,
उसके दांत बर्फ़ की तरह
पिघल जाएंगे
और वो पोपली हो जाएगी।

तुम फिर भी मुस्कुराते रहे
तो तुमसे बुरी तरह डर जाएगी,
तुम्हारी मौत तुम्हारे सामने ही
मर जाएगी।

Monday, May 30, 2011

भूली तुम मेरा प्यार

==भूली तुम मेरा प्यार===
अब कैसे लिखूंगा ? मैं वो रचना,
जिसमे तुम्हारे रूप का होता वर्णन,
अब कौन बनेगा ? मेरी वो प्रेरणा,
जब तुम ही चले गए छोड़ मुझे राह में,
चेतना में अब विराम सा लग गया,
और शून्य जैसे ह्रदय में हो जड़ गया,
कहाँ दौड़ा पाऊंगा मैं मन के वो अश्व,
जो उड़ाते थे तुम से मिलने को नभ में,
जो अपने पंखों को फैला करते थे हमेशा
तुम्हारे माधुर्य रूप लालिमा को अंगीकृत,
एक दीप्त्य्मान ज्योति सी तुम्हारी छवि,
जो मैं प्रतिदिन अपने भीतर गहरी करता,
और उसमे हर पल नए नए रंग था भरता,
ओज़स मेरे भीतर आता था तुमसे बहकर,
तुम्हारे सानिध्य से होती तृप्ति, रह रहकर,
युग बीत जाते कुछ ही पलों में, छूमंतर हो,
मैं और तुम, तुम और मैं, कुछ न अंतर हो,
और फिर बैठ जाता,ऐसे ही कुछ लिखने,
मन हो जाता प्रकाशित, तुम लगती दिखने,
कुछ बंधन बाँध स्वयं को, मैं सिहिर पड़ता,
किसी अहाट को सुन, तुमसे विछोह से डरता,
अब जब तुम चली गयी, ना जाने क्यों और कहाँ,
मैं खोजता फिरता हूँ प्रिये, अब तुम्हे यहाँ वहाँ,
साथ लेकर चली गयी तुम मन के भाव भी मेरे,
उजियारा भी अब रहा नहीं, छाये चहु ओर अंधरे,
लेखनी भी अब मेरी चलने से करती है इंकार,
मैं नहीं भुला तुम्हे प्रिये, किन्तु भूली तुम मेरा प्यार...
=======मन-वकील