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Saturday, September 8, 2012

"खोया हुआ नसीब"

"खोया हुआ नसीब"
बुढ़िया की मोतियाबिंद से सजी आँखों में,
कम दिखाई देती परछाइयों को समेटे हुए,
जिन्हें कल संजोये थी अपनी खोख में वो,
जिन्हें खिलाती रही थी अपना भी निवाला,
वो आज कहाँ जा बसे,अब क्यों नहीं करीब,
धुंधली धुंधली लकीरों सा,खोया हुआ नसीब,
कूड़े के ढेर पर बैठे कुक्कर के संग वो नन्हे,
नन्हे हाथों से बीनते थे कागज़ के चीथड़े वो,
वो चंद चीथड़े भी आज है उनके तन पर भी,
चेहरे पर छपी मासूमियत भी होती ओझल,
शक्ल पर अब बेबसी है जो आ बैठी करीब,
बदबू से लिपटे मासूमो का, खोया हुआ नसीब,
कभी भागती रहती यहाँ से वहां हो बदहवास,
कभी चंद लिखे मुड़े से वो कागज़ मुठ्ठी में,
कभी आँखों में उभर आती बेबसी बन भूख,
जो छोड़ चला गया ऐसे, घेरती अब उसे धूप,
बड़े बाबू की वो भूखी नज़रें,क्यों लगती करीब,
क्यों जिन्दा है वो सोचती, खोया हुआ नसीब ...
==मन वकील