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Friday, October 7, 2011

पेट के खातिर

पेट के खातिर इंसान जाता देश से बाहर,
पेट के खातिर औरत जाती अपने घर के बाहर !
घर से रह कर दूर हम बुनते घर का सपना!
जब वही करे औरत , तो लोग कहते उसे वासना!
परिवार के वास्ते करते हम अपने ऊपर वालों की गुलामी,
औरत लेती  हर एक रात किसी गैर मर्द की सलामी!
कोई मुझे समझाए फर्क क्या है इन दोनों की किस्मत में,
हर वक़्त करते समझौता, किसी और की खिदमत में!
इंसान की फितरत है खुद को झंझोरना,
मगर क्या अच्छा है ये दूसरों पर दोष लादना?
अगर हम करें तो नौकरी और वो करे तो वासना पूर्ति
हम करें तो बलिदान और वो करे तो बदचलन मूर्ति?

==मन वकील