Get the updates in your MailBox

Sunday, March 25, 2012

गुमनाम शहीद!

लो अब बाँध दिए है मेरे दोनों हाथ,
और रस्सी का कसाव मेरे जोड़ो पर,
शायद साम्राज्यवाद कसना चाहते वो,
जो धीरे धीरे खोखला हो गया है अब ,
मेरे दोनों बाजूं पकड़ कर ले चले,
वो मेरे हम-वतन भाई उस ओर ऐसे,
जैसे नमक हलाली का सारा फर्ज़ ही,
चुकाना चाहते हो वो उन फिरंगियों का,
मैं भी तेज़ तेज़ क़दमों से डग भरता,
इस रोज़ रोज़ के मरने से चाहता मुक्ति,
शायद नए विद्रोह की आहट सुनाई देती,
या पुरानी बगावत अब फिर से जवाँ होती,
कहीं खामोशियों का सिलसिला टूटता हुआ,
और शोर का सैलाब है बस अब आने को,
सुबह सूरज से पहले, लेने आ गयी है ,
संग अपने लेने मुझे शहादत की परी,
जो मेरी रूह को चूम, ले जायेगी मुझे,
पर मेरे जाने से, भर जायेगी फिर से,
उस लहू में एक नयी तपिश सरगर्मी,
जोश उभरेगा और ले डूबेगा अपने साथ,
इन फिरंगियों के जलालत -ऐ-जुल्म,
और लूटेरगर्दी की वो गन्दी फितरत ,
बस सोच है जो अब समेट रही मुझे,
खौफ से दूर, मैं नयी दुनिया की ओर,
अपने कदम बढाता हुआ बस ऐसे ऐसे,
उन हाथों ने मुझे लाकर खड़ा कर दिया,
उस सर्द लकड़ी के तख्ते पर, नंगे पाँव
पर मेरे जोश की तपिश, सुलगा देगी,
इस निरीह लकड़ी में भी एक चिंगारी,
जो जलाकर खाक कर देगी शायद अभी,
इन फिरंगियों की बेसाख्ता हकुमत को,
तभी दो कांपते हाथ मेरे ही हमवतन के,
ढँक देते मेरे चेहरे को शहादत के कफ़न से,
जो कालिख समेटे हुए एक रोशनी देता हुआ,
रूह को मेरी, उस अनजानी डगर की राह पर,
अचानक गले में लिपट जाता मेरा नसीब ,
सख्त पटसन के नर्म रेशों से सहलाता हुआ,
और फिर कसाव और कसाव और कसाव ,
मैं पहले अँधेरे दर से गुजरता हुआ एकाएक,
आ मिलता उस शहादत की सफ़ेद डगर पर,
पीछे छोड़ गया हूँ अब मैं एक ऐसा इतिहास
जो मेरे मुल्क की आज़ादी की पहचान होगा,
शायद गुमनाम शहीदों में अब मेरा भी नाम होगा //////
==मन वकील