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Saturday, October 1, 2011

मेरी तारीफ़ ना करना



प्यारे मित्रों ऐसे यूँ मेरी तारीफ़ ना करना ,
अरे इन्सान हूँ एक, मेरी फितरत है डरना,
कभी बुरा हूँ मैं और तो कभी बहुत बुरा हूँ ...
आदत न हो जाये मेरी गिरगिट सा रंग बदलना ,
सच्चा ना था कभी, फिर भी सच है मन में,
शायद इस कारण भूल गया मैं सबसे झगड़ना,
लोभी होता कभी मैं तो खुद से डर कर ऐसे,
पाप के अंधे रस्तों पर आने लगा मुझे संभलना !

==Man-Vakil

प्रेम कवि

वो कहते रहते मुझे प्रेम कवि,
शायद मैं ऐसा कवि था नहीं कभी ,
क्षणिक भंगुर तुकबन्दियाँ ही जोड़ ,
मैं करता रहता दिलों में बस भागदौड़,
मन की व्यथा या मन की उत्तेजना,
जब भी उठती, मैं लिख देता बस तभी,
वो कहते रहते मुझे प्रेम कवि,
शायद मैं ऐसा कवि था नहीं कभी ,
उन मित्रों को, जिन्हें न देखा मैंने,
पहनाये उनको भी आदर प्रेम-गहने,
नीरस जीवन में बस रस-स्वादन करने,
मैं आ बैठता यहाँ, खग जैसे जभी तभी,
वो कहते रहते मुझे प्रेम  कवि,
शायद मैं ऐसा कवि था नहीं कभी ....

Sunday, September 25, 2011

नारी!

वो कभी माँ है, बेटी है और बहन भी है ,
वो प्रेमिका है, वो संगिनी जीवन भी है,
वो कई कई रूप में मेरे सामने है अवतरित,
वो मुझे मुक्त कर दे ऐसा पाप दहन भी है,
कभी शक्ति स्वरूपा, कभी एक बरगद है,
वो जो जननी पालिता है उसे नमन भी है,
वो हमेशा रखती ख्याल अपनों का भी है
प्यार की मूरत और दुर्गा का एक रूप भी है
धरती सी सहनशील,दुष्ट विनाशिनी भी है
संसार को आगे बढ़ने वाली माँ भी है
पुरुष प्रधान संसार में, अस्तित्व बनाती भी है
प्यार का दरिया, सागर
समान व्याप्त भी है!!

==man-vakil