Tuesday, May 17, 2011

निस्वार्थ प्रेम

क्या होता है सच्चा प्रेम? और क्या है इसकी परिभाषा,
जीवन में कभी दिखा ही नहीं, न ही की कभी इसकी आशा,
संवेंदनायों ने कभी महसूस नहीं किया, कभी इसकी परतों को,
जीवन केवल पाया हमने, केवल व्यापार और सौदों की शर्तों को,
तन की ज्वाला जलती बुझती देखि, और देखि बस वासना,
केवल यौन संबंधों के फलते बीज देखे, और उनके आसना,
सच्चा प्रेम पढते रहें हम, केवल कवितायों और लेखों में ,
परिभाषित करने में रहे असमर्थ, विचरण सा था अनदेखों में,
केवल इक रिश्तें में ही पाया हमने इस सच्चे प्रेम का मूल आधार,
मित्रो सभी रिश्तें मुनाफे के लिए होते, केवल निस्वार्थ माँ का प्यार...
==========मन-वकील

प्रेम का महाबली

वो जो सोनी है मेरे ह्रदय की धड़कन में वास करने चली
वो जो बेबाक है पर उससे सजती मेरे दिल की सूनी गली,
उसके शब्दों के उद्ध्गार विचलित करते मुझे, वो मनचली
फिर भी उससे मिलने को रहता बैचेन, वो लगती मुझे भली,
वो कहाँ से आती, कहाँ है जाती , जैसे पलाश पुष्प की कली,
मन के भीतर वो आकर देती दस्तक, पूछूं कैसे तू कहाँ चली,
जैसी भी है तू मेरी है सोनी, तेरे ह्रदय में करता हूँ मैं खलबली,
समझ प्रेम निवेदन या इसे जोर, पर हूँ मैं भी प्रेम का महाबली...
---------मन-वकील

सोनी की आस में

अब जब भी तुझे देखता हूँ,
तो नेत्रों से रक्त बहने लगता ,
और तुझे छूते ही, मेरे हाथों में,
कुछ होता और, रक्त बहने लगता,
गले में ध्वनि फँस गयी है अब मेरे,
तुझे पुकारते ही, रक्त बहने लगता,
शायद अब तुम हो गयी , "सोनी "
किसी देवश्राप की अनुभूति सी,
क्योकि अब तो तुम्हे सोचते ही ,
मेरे मनस पटल में रक्त बहने लगता,
कितनी पीड़ा होगी शायद भीतर,
तुम्हारे ह्रदय के रक्त में बहती हुई,
जो ना जाने कैसे , जाने क्यों, कब,
आकर चुपचाप बस गयी है मेरे भीतर,
मन-वकील का केवल मन ही नहीं,
समस्त चिंतन भी रक्तमयी है अब तो,
सोनी , ये तुमसे जड़ से चेतन तक,
प्रेम करने का फलित श्राप सा है ,
जो मुझमे तुम्हे देखने लगा है, और
तुम मेरे भीतर भी रक्त-रंजित सी हो,
अब तुम्हे पाना और अपने भीतर ही,
संजोकर रखना है जीवन का उद्देश्य,
क्योकि सोनी अब भी मेरे लिए तुम,
श्राप नहीं एक पूर्ण अभिव्क्यति हो,
मेरे प्रेम की उस सृजन कर्ता के प्रति,
जो सोनी को रक्त में बसा कर मेरे,
मुझ मन-वकील को रक्तिम राह पर,
तीव्रता से उड़ाकर ले जा रहा है, अब
अपनी और , मेरी सोनी की आस में,
======मन-वकील

रास रचैया...

आज सखी मोहे श्याम रंग भायो ,
सांवरे रंग मोये निरालो प्रेम धायो,
अरे गौरों रंग तो फीका पड़ जाएगो,
और सांवरो गहरो हो तन पे छायेगो,
शीतल बन रंग श्याम सो मिलायेगो,
रस रचैया मन में बस एसो लुभायेगो,
अरे कारी आँखों में कजरारे सो अघायो,
आज सखी मोहे श्याम रंग भायो ,
सांवरे रंग मोये निरालो प्रेम धायो,
======मन-वकील

क्यों विकल है? आज मन तू...

क्यों विकल है? आज मन तू,
निकल पड़ आज उस राह पर,
जहाँ सुमन से अधिक हो भरे,
कांटें , मान और अपमान के,
क्षुधा और सुधा के भेद में खोये,
भूल जा सब चेतना के अंश तू,
जहाँ खुले आसमान से ढँक जाये,
तेरी स्मृतियों के सुलगते से ढेर ये ,
जहाँ रात्री की कालिमा,छाये कुछ ऐसे,
और भरे कुछ खुली अनखुली सी परतें,
तेरे अश्रुरक्त रंजित बीतें हुए कल की ,
और ध्वनि भी अब बदले कुछ ऐसे,
जैसे धर लिये हो उसने नए आयाम,
विचलन और स्तम्भन का वो अंतर,
जहाँ तुझे मिलें कुछ नया सा अम्बर,
स्वरों के बीच उभरे कुछ नए सम्वाद से,
और मिलें नए पथिक और नए फासले,
क्यों विकल है? आज मन तू,
निकल पड़ आज उस राह पर, 


=====मन वकील..

लड़ाई...

अरे लड़ने को तो पड़ी है यारो, तमाम ये जिंदगी सारी,
फिर भी हाथों में उठा हथियार करते है हम क्यूँ तैयारी,
बातों के झमले से उगाते है,नफरत की, आग की क्यारी ,
और जब उजड़ जाता है यह चमन, तो रोते बैठ उम्र सारी,
खुशियाँ ना जो ढूंढ पाए कभी, आँखें थी अंधी शायद हमारी,
और जिसे प्यार समझे थे,वो शोला थी एक आग की चिंगारी,
घर को ही खाक कर बैठे हम अपने, पर जिद्द ना टूटी हमारी,
अब उसी खाक में ढूंढते है निशान कुछ, करके खुद हराकारी,,,,,,,,,,
========मन-वकील

फर्क........

प्यार के इज़हार में , और खंज़र के वार में,
कोई फर्क नहीं होता है , इक जैसे ही होते है,
दोनों ही देते , मेरे जिगर में गहरे वो जख्म,
लहू की तासीर में दोनों, एक जैसे ही होते है,
उनका दीदार मिले, तो मने ईद का कोई जश्न ,
दुआओं में उठते है वो हाथ, हम फिर भी रोते है,
उनकी शोखियाँ, वो उनकी अदाओं का सितम,
जब वो दिखे कहीं, मियां हम खुदा के बन्दे होते है..
=====मन-वकील

छोटू.......

अरे छोटू, कहाँ मर गया है, हरामजादे,
चल जा उस टेबल पे कपड़ा मार जल्दी,
वो भागता उस टेबल की और तेजी से ,
और ये गालियाँ अब उसकी किस्मत है,
उस टेबल के आसपास कुर्सियों पे बैठे,
वो भद्र-पुरुष और नारियां, न जाने कैसे,
अपना वार्तालाप बीच में छोड़ अचानक,
छोटू को देख, नाक मुहं ऐसे सिकोड़ते ,
जैसे किसी कूड़े के ढेर पर हो वो बैठे,
उसके सफाई वाले कपडे से आती दुर्गन्ध,
उन्हें उस छोटू के भीतर से आती हुई लगती,
छोटू के वो छोटे हाथ एकाएक, तेज़ तेज़ ,
उनकी टेबल पर छपी चिखट को मिटाते,
और उधर उसका वो बचपन भी धीरे से ,
मिटता जाता, चुपचाप, बिना किसी शोर के,
और वो भद्र मानुस और मेमसाब, देख कर सब,
ऐसे अनजान से बने रहते, मूर्ति के जैसे, जड़वत,
जैसे उनके अपने आँगन में बालावस्था न हो,
और फिर वो भद्र पुरुष, प्रकट करते अपने चरित्र,
चीख कर कहते , जैसे वो हिमालय पर हो चढ़े ,
अबे छोटू , जा जल्दी से दो स्पेशल चाय ला,
और हाँ, साले उँगलियाँ गिलास में मत डालियो,
जैसे छोटू इन भद्र मानुस का कोई गुलाम हो,
और छोटू के कदम मुड जाते, भट्टी की ओर,
जैसे वो चाय लेने नहीं, खुद को उस भट्टी में ,
झोंकने जा रहा हो, बदकिस्मती से बचने के लिए,
रोज़ रोज़ की गालियाँ और बोनस में पड़ती लातें,
और कभी कभार, आने वाले ग्राहकों के थप्पड़,
उसने भुला दिया है इन सब के बीच, सहते हुए,
अपना वो बचपन, जो उसे खिलाता और खेलाता,
कभी अपने बापू के कन्धों पर सवारी करवाता,
और माँ के हाथों से लाड से दाल भात न्योत्वाता,
परन्तु बापू के गुजरने के बाद , परिवार का बोझ,
नन्ही नन्ही बहनों की फटी हुई मैली फ्रान्कें,
और माँ के हाथों में आ चुकी वो कुदाल और टोकरी,
कहाँ लेकर आ गयी है , इस छोटे से छोटू को ,
उसके बचपन से कोसो दूर, इस चाय की दुकान पर,
जहाँ पेट में रोटी से पहले, गालियाँ और लातें मिलती,
उसके बचपन के बचे हुए अंश को मिटाने के लिए,
जो भीतर तो छुपा है , पर हमेशा लालायित रहता,
उसके बाहर आने को किसी रोज़, मरते हुए भी ............
===========मन-वकील

हे प्रिये सोनी

अब कभी भी , कोई चेष्टा ना होगी,
तुझे प्राप्त करने की , हे प्रिये सोनी,
फलीभूत हो गयी है श्रापों से निरंतर,
हमारी प्रेम गाथा,विचित्र सी धूसरित,
मेरी भूल थी, जो स्मरण न रख पाया ,
कभी तुम्हारे उस देव-तुली अभिरूप को,
न मान सका, टूटे ह्रदय से , जान भूझकर,
तुम्हारे एक निष्काषित देव-कन्या होने को,
और इंगित भी ना कर पाया कभी मन से,
तुम्हारे इस नगर-वधु होने के कारण को,
और आपेक्षा सदैव उपेक्षा को धकेलती रही,
निरंतर प्रत्यंतर, अनजानी सी एक आस में,
मैं मन वकील नित बुनता रहा न जाने क्यों?
स्वपन , तुम्हारे संग चन्द्र-मास बिताने के,
नेत्रों में , जैसे तुम अश्रुओं से अधिक थी बसी,
और मैं , करता रहा तुम्हारी हर अक्षम्य सी ,
भूल को, किस सुध में बेसुध हो क्षमा,हर-बार,
व्याकुलता की तीव्रता , आन बसी थी कहाँ से,
मेरे भीतर, जो अग्नि से तेज़ तपित कर देती,
मेरे ह्रदय में तुम्हारे प्रति, उस कुलषित मोह को,
और तुम सदैव अंगीकृत करती रही , वासनित हो,
अनजान पुरुषों के कामुकता-जनित आलिंगन को,
और मैं प्रतीक्षा-रत हो, पलकें बिछाएं खड़ा रहा,
तुम्हारे लिए चिंतन-रत, एक साधक सा बना रहा ,
तुम लगी रहती , औरों के चित भरमाने मध् सी,
और मुझे, सोनी ने जल से भी तृप्त नहीं दिया कभी ,
मुख पर बोल भी हो गए, एक सुखी नदी के समान,
जो तुम्हे कहने को तो होते आतुर, और बह न पाते,
तुम्हारे प्रणय प्रसंगों ने, भर दिए थे केवल अवसाद,
जो रह रह कर आते ज्वार भाटा के लहरों की भांति,
मेरे मन के अथाह सागर में , केवल शांति भंग करने,
रक्तिम हो चुकी नेत्रों के पुतलियाँ , बार बार रुध्रण से ,
और वाणी साथ छोड़ गयी थी , तुम्हारे जैसे , क्रंदन से,
परन्तु मन की एक आस , दूर एक शिवालय की लौ सी,
जलती रही भीतर, इसी आस में, सोनी तुम फिर आओगी,
लौट कर ,इस भूलोक में , केवल मेरे लिए और मेरे पास....
=========मन-वकील

Monday, May 16, 2011

क्या लाया था क्या ले जाओगे???:

Another Sweet Poem which is really heart touching by Man-Vakil

रुक गया हूँ मैं अभी , और नेत्र भी अब है थक चुके ,
क़दमों से बंध गयी धरती साथ , प्राण भी मृत हो चुके,
चेतना शून्य होने तक रहा सफ़र, अब श्वास मर चुके,
स्पंदन भी नहीं रहा तन में, श्वेत चादर अब ढँक चुके,
मूल से अवमूल होने तक स्मृतियों के जड़ कट चुके,
लीन होने उस ब्रह्माण्ड में, आत्मा अश्व कूच कर चुके,
शेष जो था, उसे कंधे पे उठा बन्धु भी अब चल चुके,
जो मिटा न पाए मुझे भीतर से, वो भी क्रंदन कर चुके,
और जो करेंगे मुझे मूर्तिमंडित, वो पाषाण भी रच चुके,
लेकिन मैं बन गया हूँ भूतकाल , जो न वापिस आऊंगा,
जितने वर्ष लिखे थे मेरे भोग विलास में, अब कट चुके,

अहिस्ता अहिस्ता:

The first poem for this cause from Man-Vakil

अहिस्ता अहिस्ता देश मेरा कुछ घटता सा जाता है,
और जनता के दिल का बोझ अब बढ़ता ही जाता है,
गुमनामी के अंधेरों से भी उठती है अनबुझी तस्वीरें,
कोई आकर, मुझमे मरी क्रांति सा जुड़ता जाता है,
और सिक्के भी अब तो पड़े रहते है इन सड़कों पे,
पर मेरी जेब में पड़ा यह नोट भी सड़ता जाता है,
अरे रोशनी के अम्बार लगे है अब उन चेहरों पे,
पेट की भूख के आगे, इनका तन बिकता जाता है,
कुर्तें पजामे,टोपी वालों से अब डर लगता है भाई,
सरकारी खजाने के भण्डार भी रोज़ घटता जाता है,
सेंध लगती है मंत्रालयों में, अब तो दिन के उजालों में,
कुर्सी से चिपके इन चोरों का हजूम भी बढ़ता जाता है
भूख से बिलकते बच्चे, चौराहों पर बिकते है रोज़ रोज़,
और योजनाओं से बाबू के घर का सामान बढ़ता जाता है,
अरे, आयोजन अब बन गए है प्रयोजन के नए उपाय,
खद्दरदारियों की पूंजी से अब खेत मेरा उजड़ता जाता है,
फौजी लड़े अब सीमा पर, पर घर में लुट जाए परिवार,
उसके मरने के दाम से, एक कांसे का पदक खरीदा जाता है,
अरे कागज के पुरूस्कार है बांटे जाते,सत्ता के गलियारों में,
हर चापलूस का, अब पद्म-अलंकारों से सत्कार किया जाता है...
अहिस्ता अहिस्ता देश मेरा कुछ घटता सा जाता है,
और जनता के दिल का बोझ अब बढ़ता ही जाता है.

Why is this Blog???

Hello friends!!

You all must be thinking why is this blog and why I am writing this blog...Just to answer few of your points and confusion...


Friends..I have a dream to do something for the child labor in our country..We together can eliminate the chil labor system from our country...So why dont we do something for them??
All I want here is just to have few original poems...which can be accumulated and then published in the form of a book..All the income from the sales of this book will be dedicated towards the betterment of the poor children in India..

So Friends,Please contribute with lovely poems and participate for better India and better Indian Future!!!


Hope you all will understand the need and try to contribute in this BLOG!!

Thanking You
Vivek Kumar Goel

Engineer- Ericsson Global Services India Pvt. Ltd.
Noida